Wednesday, October 19, 2022

The 205th birth anniversary of Sir Syed Ahmad Khan in Aligarh Muslim University

 

The 205th birth anniversary of Sir Syed Ahmad Khan   1817-1898), a philosopher and educationist, who, in    1875, established the Muhammadan Anglo-Oriental     (MAO) College which is today known as the Aligarh   Muslim University (AMU), was celebrated on the   university campus on Monday. Every year, the       occasion is celebrated as Sir Syed Day on the   university’s campus.

The Sir Syed Day celebrations, marking the 205th birth anniversary of Aligarh Muslim University (AMU) founder, Sir Syed Ahmad Khan returned back in meatspace after two years of Covid induced restrictions with traditional gaiety and vigour.  Guests, arrived in the elegant vintage phaeton drawn by a pair of horses at the venue of Gulestan-e-Syed, where they were ushered to the stage by a long line of assembled students of the University Riding Squad. Delivering the Sir Syed Day commemoration address, the Chief Guest, Prof Tahir Mahmood (Former Chairman, National Commission for Minorities) called the AMU community to spread Sir Syed’s rationality, modernity, manners and amity to corners of the Nation and the world. “Preservation and propagation of Urdu is also an integral part of Sir Syed’s legacy that needs our attention”, said Prof Mahmood. He pressed the need for a deep focus on Sir Syed’s thoughts and teachings that emanated through the words of Allama Iqbal in one of his poems, ‘Syed Ki Loh-e-Turbat’.

“Reflecting on Sir Syed’s philosophy, Allama Iqbal wrote, ‘Mudda’a Tera Agar Dunya Mein Hai Taleem-e-DeeN, Tark-e-Dunya Qaum Ko Apni Na Sikhlana Kahin’ (If your aim in the world is Deen’s education, Never teach your nation world’s abdication). In this context, we need to understand that Sir Syed was awakening the community and convincing it for the new education system in an era when the rational and traditional aspects of the education system got intertwined and had taken the form of theological education”, emphasised Prof Mahmood.

 “Sir Syed played a very influential role in bridging the gap between the Oriental and the Western world. He knew what changes were required in society in order to move forward and keep up with the rest of the world. He dedicated his life to striking a balance between tradition and modernity and strived for traditional Oriental and Western scholarship”, said Prof Mahmood.

In the welcome address, AMU Vice Chancellor, Professor Tariq Mansoor said, “Sir Syed’s ideas of secularism and inclusiveness are reflective in the way AMU operates. The University is a monument of large-hearted tolerance and communal harmony and its portals are open to the students of all communities from its very inception”.

“We have maintained Peace and Harmony on the campus and successfully overcome challenges, problems and crisis by exercising restraint and stressing on unity and consensus”, the Vice Chancellor pointed out.He emphasised, “AMU is marching ahead for progress and development. The Prime Minister, Shri Narendra Bhai Modi while participating in the centenary year celebrations called AMU as ‘Mini India’ and praised the contribution of the university in Nation building. Besides Prime Minister’s participation, the last five years also witnessed the participation of the then President of India, Shri Ram Nath Kovind and others in various events of the University”, he emphasised. Prof Mansoor added, “Despite the Covid pandemic; a record number of new courses, colleges and departments started at AMU”.

 

 

 

The Sir Syed Day celebrations : Marking the 205th birth anniversary of Aligarh Muslim University (AMU) founder

 

सर सैयद डे समारोह..... दो साल के कोविड प्रतिबंधों के बाद

 साक्षात् आयोजन

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के संस्थापकसर सैयद अहमद खान की 205वीं जयंती को चिह्नित करते हुए सर सैयद दिवस समारोह का आयोजन आज दो वर्षों के कोविड प्रेरित प्रतिबंधों के बाद वास्तविक रूप से मनाया गया जिसमें मुख्य अतिथि एवं मानद अतिथियों को यूनिवर्सिटी राइडिंग स्क्वाड के छात्र सदस्यों द्वारा कुलपति की अगुआई में विश्वविद्यालय की रिवायती बग्घी में गुलिस्तान-ए-सैयद के बेहद सुसज्जित पंडाल तक लाया गया।

सर सैयद दिवस स्मृति भाषण देते हुए मुख्य अतिथिप्रोफेसर ताहिर महमूद (पूर्व अध्यक्षराष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग) ने सर सैयद की तर्कसंगतताआधुनिकताशिष्टाचार और मित्रता को देश और दुनिया के कोने-कोने में फैलाने के लिए एएमयू समुदाय का आह्वान किया।

उन्होंने सर सैयद के विचारों और शिक्षाओं पर गहन ध्यान देने की आवश्यकता पर बल दिया जिसकी अभिव्यक्ति अल्लामा इकबाल की एक कविता, ‘सैयद की लोह-ए-तुर्बत’ में उनकी ओर से की गयी है।

प्रोफेसर महमूद ने कहा कि सर सैयद के दर्शन पर विचार करते हुएअल्लामा इकबाल ने लिखा, ‘मुद्दआ तेरा अगर दुनिया में है तालीम-ए-दीनतर्क-ए-दुनिया कौम को अपनी ना सिखलाना कहीं। इस संदर्भ मेंहमें यह समझने की जरूरत है कि सर सैयद समुदाय को जागृत कर रहे थे और नई शिक्षा प्रणाली को अपनाने के लिए उसका आह्वान कर रहे थे।

उन्होंने कहा कि सर सैयद का मानना था कि अंग्रेजी शासन का विरोध किया जाना चाहिए लेकिन अंग्रेजी शिक्षा का नहीं। वह जानते थे कि पश्चिमी कला और विज्ञान की मदद से भारतीय उच्च लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन उनका सफर आसान नहीं था। रूढ़िवादी लोगों द्वारा उनकी आलोचनातिरस्कार और निंदा की गई जो सोचते थे कि अंग्रेजी-शिक्षा लोगों को धर्म से दूर ले जाएगी।

उन्होंने ने कहा कि सर सैयद ने ओरिएंटल और पश्चिमी दुनिया के बीच की खाई को पाटने में बहुत प्रभावशाली भूमिका निभाई।




वह जानते थे कि आगे बढ़ने और बाकी दुनिया के साथ बने रहने के लिए समाज में किन बदलावों की जरूरत है। उन्होंने अपना जीवन परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन बनाने के लिए समर्पित कर दिया और पारंपरिक ओरिएंटल और पश्चिमी ज्ञान के विस्तार के लिए प्रयास किया।

स्वागत भाषण मेंएएमयू के कुलपतिप्रोफेसर तारिक मंसूर ने कहाकि सर सैयद के धर्मनिरपेक्षता और समावेशिता के विचार एएमयू के संचालन के तरीके में प्रतिबिंबित होते हैं। विश्वविद्यालय उदार ह्रदयसहिष्णुता और सांप्रदायिक सद्भाव का एक स्मारक है और इसके द्वार सभी समुदायों के छात्रों के लिए शुरू से ही खुले हैं।

कुलपति ने कहा कि हमने परिसर में शांति और सद्भाव बनाए रखा है और संयमएकता और आम सहमति के आधार पर चुनौतियोंसमस्याओं और संकट को सफलतापूर्वक दूर किया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि एएमयू प्रगति और विकास के पथ पर आगे बढ़ रहा है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र भाई मोदी ने शताब्दी वर्ष समारोह में भाग लेते हुए एएमयू को ‘मिनी इंडिया’ कहा था और राष्ट्र निर्माण में विश्वविद्यालय के योगदान की प्रशंसा की थी। प्रधान मंत्री के अलावागत पांच वर्षों में भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति श्री राम नाथ कोविंद और अन्य विशिष्ठ व्यक्ति विश्वविद्यालय के विभिन्न कार्यक्रमों में भाग ले चुके हैं।

Sunday, October 2, 2022

Mohammad Furqan Mayor Aligarh atteded Reception Ceremony of Garandson of Thakur Dalveer Singh

 

Aligarh zile ke Baroli Vidhansabha se kai bar chune gaye Vidhayak Thakur Dalbeer Singh ke pote ke Reception mein Aligarh ke Mayor Shri Mohammad Furqan ne shirkat ki. 

Yeh samaroh Koshambi ke Hotel Raddison mein hua. Mayor Mohammad Furqan sb ka Swagat swem Thakur Dalbeer Singh ji ne kiya sath hi Aligarh ke MP Shri Sateesh Gautam aur BJP ke anek Leadron ne swagat kar Diner karaya. 



Mayor Furqan sb ke saath Dr. Masood Ahmad bhi photo mein dekhe ja sakte hai

Saturday, September 24, 2022

SHAFQAT KAMAL IS INVITING STUDENTS TO TAKE ADMISSION IN UP CIVIL SERVICE COACHING IN LUCKNOW ; ESTABLISHED BY GOVT. OF UP

 




Mr. Shafqat Kmal (IAS ) took charge of UP IAS Coacing in Lucknow from Mr. Rizwan Ahmad (Ex DGP ,UP)  

Reporting by Dr. Masood Ahmad, Editor www.salamevatan.org,

Friday, September 9, 2022

Educational Conferece of All India Educational Movement, New Delhi

 


HOD , NCERT Delhi Smt Anita Nanoo

vkWy bafM;k ,twds’kuy ewoesaV ds 12वें शिक्षा सम्मेलन के प्रस्ताव

ऑल इंडियvkWy bafM;k एजूकेशनल मूवमेंट और मुस्लिम एजूकेशन सोसायटी जयपुर द्वारा 3&4 सितंबर 2022 को संयुक्त रूप से जयपुर में आयोजित 12वें अखिल भारतीय शैक्षिक सम्मेलन के हम सभी प्रतिनिधि, इस महत्वपूर्ण आयोजन के लिए मेजबान संगठनों की सराहना करते हैं और निम्नलिखित प्रस्तावों को स्वीकार करते हैं जिससे कि इन पर सभी संबंधित विभागों] अधिकारियों संस्थाओं और व्यक्तियों द्वारा संतोषजनक कार्यान्वयन हो सके। 1& जुलाई 2020 में जारी राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (एनईपी) भारतीय शिक्षा प्रणाली को अगले तीन दशकों तक नियंत्रित और विनियमित करेगी और यह दस्तावेज़ उन सभी लोगों के लिए जो इस क्षेत्र में लगे हुए हैं संविधान और शिक्षा संबंधी क़ानूनों के बाद एक प्रमुख संदर्भ बिंदु होगा।  इसलिए, शिक्षाविदों, स्कूल प्रबंधनों, शिक्षकों, तकनीकी विशेषज्ञों, कार्यकर्ताओं, अभिभावकों और छात्रों को भारत में शिक्षा के भविष्य के लिए इसके महत्व को समझना चाहिए और इसके व्यावहारिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए ईमानदार प्रयास करने और करवाने चाहिएं। 

2. प्रतिनिधि एनईपी से कई अवसरों की आशा करते हैं जैसे कि पाठ्य पुस्तकों में सांस्कृतिक विविधता की अवधारणा, शिक्षा का निजीकरण, स्वायत्त कॉलेज का गठन, विशेष शिक्षा क्षेत्र की स्थापना, समावेश कोष, लिंग समावेश कोष, अल्पसंख्यकों सहित वंचित वर्गों की एसईडीजी के तहत विशेष देखभाल, पाठ्यक्रम का लचीलापन मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा, वैकल्पिक शिक्षा प्रणाली के तहत मदरसे का प्रबंधन]ऑनलाइन शिक्षा, प्ले स्कूल के माध्यम से प्रारंभिक बाल्यावस्था शिक्षा की अवधारणा, आदि। आवश्यक जागरूकता, सक्रियता और संस्थागत प्रयासों के माध्यम से इन आशाजनक पहलुओं का बेहतर लाभ उठाया जा सकता है। इसलिए, प्रतिनिधि खुद अपने आप से और सभी संबंधितों से एनईपी के इन ऊंचे लक्ष्यों को सही ढंग से साकार करने के लिए काम करने का आग्रह करते हैं। 

 

3. प्रतिनिधियों द्वारा यह चिह्नित किया गया है कि एनईपी में निहित व्यावसायीकरण से मुसलमानों सहित सभी कमज़ोर वर्गों को शिक्षित करने के लिए बढ़ी हुई धनराशि की आवश्यकता होगी। इसलिए, समुदाय को हर स्तर पर शिक्षा निधि की स्थापना करनी चाहिए, संस्थागत निधि के लिए वक्फ संपत्तियों का प्रभावी ढंग से उपयोग करना चाहिए, बच्चों को शिक्षित करने के लिए धूमधाम से विवाह आदि जैसे अनुत्पादक उपयोग से संसाधनों को शिक्षा में लगाना चाहिए, जागरूकता और सरकारी जवाबदेही के माध्यम से अल्पसंख्यक छात्रवृत्ति और अन्य योजनाओं का प्रभावी ढंग से लाभ उठाना और अन्य आवश्यक क़दम उठाने चाहिए। 

4&प्रतिनिधि समझते हैं कि एनईपी पर प्रभावी कार्यान्वयन के लिए, विभिन्न स्तरों पर सामाजिक-आर्थिक रूप से वंचित समूहों (एसईडीजी) के मज़बूत पारस्परिक सहयोग की आवश्यकता है। इसलिए, सभी हितधारकों को इस सहयोग को साकार करने का प्रयास करना चाहिए। 

5. प्रतिनिधि संतुष्टि महसूस करते हैं कि देश में मुस्लिम लड़कियों की शिक्षा के संबंध में एक सकारात्मक बदलाव दिखाई दे रहा है। इस तरह के प्रयासों को केवल जारी रखने की ज़रूरत है बल्कि बढ़ती चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए उन्हें और बढ़ाना भी आवश्यक है। मुस्लिम महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए, प्रतिनिधियों ने संबंधित अधिकारियों को यह सिफारिश करना उचित समझा है कि वक़्फ संपत्तियों का उपयोग जिला स्तरीय दस्तकारी प्रशिक्षण केंद्र के लिए भी किया जाना चाहिए ताकि विधवाओं, अनाथों और अन्य जरूरतमंद महिलाओं को सशक्त बनाया जा सके और जिन्हें एमपी और एमएलए विकास निधि के माध्यम से विकसित किया जा सके, अल्पसंख्यक मामलों के विभाग की सहायता से या इसकी अनुपस्थिति में समाज कल्याण विभाग के माध्यम से। 6& प्रतिनिधियों ने अल्पसंख्यकों को शिक्षित करने के लिए राजस्थान की मौजूदा सरकार के प्रयासों की सराहना की, जहां कि यह सम्मेलन आयोजित किया गया था और आशा की कि ये प्रयास भविष्य में भी ईमानदारी से जारी रहेंगे। 7. सम्मेलन की चर्चाएं यह स्पष्ट करती हैं कि भविष्य की शिक्षा प्रौद्योगिकी से संचालित होगी। अतः सभी सामुदायिक शिक्षा संस्थानों को इस आगामी चुनौती के लिए खुद को तैयार करने के लिए उचित प्रयास करने चाहिएं। 8& सम्मेलन में मुस्लिम समुदाय में पाये जाने वाले एक कारीगर वर्ग की क्षमता को बार-बार उजागर किया गया है, जो युवाओं में विभिन्न उपयोगी कौशल विकसित करने के लिए रचनात्मक और अभिनव तरीकों की मांग करता है। इस उद्देश्य के लिए बड़े पैमाने पर कौशल विकास के लिए हर स्तर पर प्रयासों की आवश्यकता को महसूस किया गया है। सभी संबंधितों से इस संबंध में उचित क़दम उठाने की अपेक्षा की जाती है। 9& 12वें अखिल भारतीय शिक्षा सम्मेलन के प्रतिनिधियों ने उपयुक्त वक़्फ संपत्तियों की पहचान करने और उनके शिक्षा संबंधी उद्देश्यों के लिए उपयोग में लाने को निश्चित करने के लिए शिक्षाविदों, विशेषज्ञों और कार्यकर्ताओं की एक उच्च-शक्ति संपन्न समिति के गठन का सुझाव दिया और अनुरोध किया] जिसमें अध्यक्ष स्थानीय वक्फ बोर्ड और सदस्य सचिव हों, जिससे कि जरूरतमंद और मेधावी छात्रों को स्थानीय और अखिल भारतीय छात्रवृत्ति के लिए सुविधाएं प्रदान करने और उनको व्यावसायिक प्रशिक्षण देने के लिए इनका समुचित लाभ उठाया जा सके। 10& प्रतिनिधि दीनी मदारिस से बड़ी संख्या में निकलने वाले छात्रों को आधुनिक/समकालीन दुनिया का सामना करने के लिए तैयार करने के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रमों की आवश्यकता महसूस करते हैं। 

11& प्रतिनिधियों ने अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिए सरकारी नीतियों, बजट और योजनाओं के बारे में उचित जानकारी और समुदाय के शैक्षिक उद्देश्यों की प्रभावी योजना और कार्यान्वयन के लिए अनुसंधान और आंकड़ों के महत्व को भी रेखांकित किया। इसलिए सभी संबंधितों को इस संबंध में आवश्यक कार्रवाई करना चाहिए। 12& प्रzizतिiनिधियों को यह भी लगता है कि एनईपी में कुछ अस्पष्ट सांस्कृतिक शब्द

हैं और यह शिक्षा नीति शैक्षिक परंपराओं की ऐतिहासिक निरंतरता को अनदेखा करने का प्रयास करती है और अतीत में उनके नकारात्मक परिणामों को भुला कर शैक्षिक सिद्धांतों के एक विशेष समुच्चय को लागू करती प्रतीत होती है। इसलिए, प्रतिनिधियों द्वारा यह आग्रह किया जाता है कि एनईपी के कार्यान्वयन के दौरान उचित सावधानी रखी जानी चाहिए ताकि देश की सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता के मद्देनजर ऐसे शब्दों की स्पष्ट रूप से व्याख्या की जा सके। 13& प्रतिनिधियों ने राज्य और जिला स्तरों पर एनईपी के बारे में व्यापक जागरूकता पैदा करने के लिए मेज़बान संगठनों और इस तरह के अन्य राष्ट्रीय प्लेटफार्मों को सुझाव दिया है कि यह सुनिश्चित किया जाए कि इसका व्यापक रूप से लाभ उठाया जा सके।

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