मकर सङ्क्रान्ति के अवसर पर विशिष्ट व्याख्यान का आयोजन
जामिया मिल्लिया इस्लामिया के संस्कृत विभाग द्वारा दिनाङ्क 15 जनवरी 2026 को मकर सङ्कान्ति के उपलक्ष्य में 'मकर सङ्कान्ति का सामाजिक एवं सांस्कृतिक निहितार्थ' विषय पर एक विशिष्ट व्याख्यान का आयोजन किया गया। जिसका उद्देश्य मकर सङ्कान्ति की परम्परा एवं उसके वैज्ञानिक महत्त्व से छात्रों को अवगत कराना था।
मुख्य वक्ता के रूप में प्रो. रामराज उपाध्याय, विभागाध्यक्ष, पौरोहित्य विभाग, श्रीलाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली ने अपने वक्तव्य में मकर सक्रान्ति के शाब्दिक अर्थ को समझाते हुए बतलाया कि इस दिन सूर्य का मकर राशि में प्रवेश होता है। सूर्य इस दिन दक्षिणायन से उत्तरायण होते हैं। उन्होंने बताया कि ज्योतिष के अनुसार बारह राशियों होती हैं। एव वर्ष में बारह महीने होते हैं। सूर्य प्रत्येक महीने एक राशि में संकमण करता है। संक्रमण के क्रम में वर्ष की छः महीने सूर्य का संक्रमण उत्तरायण में होता है एवं छः महीने की शेष छः राशियों में सूर्य दक्षिणायन रहता है। जब सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है तो सर्य का उत्तरायण प्रारम्भ हो जाता है। उत्तरायण का काल प्रकाश का काल माना जाता है। देवता भी इस उत्तरायण हेतु प्रतीक्षारत रहते हैं। इस काल की प्रतीक्षा महाभारत में शरशय्या पर पड़े भीष्म पितामह ने अपने प्राण त्यागने के लिए भी किया था। वस्तुतः मकर सङ्गान्ति का दिन उत्थानकाल का प्रारम्भिक दिन है, अतः इस दिन का विशेष महत्त्व है। यह भारत के अनेक राज्यों में धूमधाम से मनाया जाने वाला पर्व है। यह आध्यात्मिकता के साथ ही सामाजिक एवं सांस्कृतिक एकता को भी रेखाङ्कित करता है। खगोलीय दृष्टि से भारत की भौगोलिक स्थिति पृथिवी के उत्तरी गोलार्द्ध में है। मकर सङ्कान्ति के पहले सूर्य दक्षिणी गोलार्द्ध में स्थित रहता है अर्थात् सूर्य की दूरी भारत से बहुत दूर होती है। यही कारण है कि मकर सङ्क्रान्ति के पूर्व की रातें बड़ी एवं दिन छोटे होते है किन्तु मकर सङ्क्रान्ति के दिन से अर्थात् सूर्य के मकर राशि में प्रवेश के साथ ही सूर्य उत्तरी गोलार्द्ध की ओर अग्रसर होने लगता है फलस्वरूप रात्रि की अपेक्षा दिन का समय बढने लगता है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे संस्कृत विभाग के अध्यक्ष प्रो. जयप्रकाश नारायण ने इस पर्व की सामाजिक प्रासङ्गिकता को रेखाङ्कित करते हुए कहा कि यह पर्व हमें सामाजिक एकता का सन्देश देता है। उन्होंने बताया कि यह पर्व भारत के अनेक प्रदेशों में मकर सङ्कान्ति, खिचड़ी, उत्तरायणी, माघी, लोहड़ी, पोंगल एवं बिहू आदि नामों से हर्षोल्लास पूर्वक मनाया जाता है। इस अवसर पर उन्होंने इस दिन बनाए जाने वाले व्यंजनों में प्रयुक्त तिल एवं गुड़ के वैज्ञानिक महत्व पर भी प्रकाश डाला।
कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित डॉ. सत्यप्रकाश, ओ.एस.डी., कुलपति ने छात्रों को सम्बोधित करते हुए मकर सङ्क्रान्ति की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को रेखाङ्कित किया।
संस्कृत विभाग के सङ्गोष्ठी कक्ष में आयोजित इस व्याख्यान का शुभारम्भ दीप प्रज्ज्वलन एवं वैदिक मंगलाचरण से हुआ। विभागाध्यक्ष प्रो. जय प्रकाश नारायण द्वारा मुख्य वक्ता, अतिथि एवं उपस्थित श्रोताओं का वाचिक अभिनन्दन एवं स्वागत किया गया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. धनञ्जयमणि त्रिपाठी एवं धन्यवाद ज्ञापन डॉ. मणिशङ्कर द्विवेदी द्वारा किया गया। अध्यापकों, शोधछात्रों एवं अन्य विभागीय छात्रों की सक्रिय उपस्थिति ने कार्यक्रम को सफल बनाया। शान्ति मन्त्र के साथ कार्यक्रम सम्पन्न हुआ।
प्रो. साइमा सईद मुख्य जनसंपर्क अधिकारी