मानू के राष्ट्रीय सम्मेलन में एएमयू की प्रो. विभा शर्मा मानद् अतिथि के रूप में आमंत्रित
अलीगढ़, 14 फरवरीः अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग की वरिष्ठ शिक्षिका प्रो. विभा शर्मा को मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी द्वारा आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में सम्मानित अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया। सम्मेलन का विषय “रेफ्रेमिंग द सबऑल्टर्न नैरेटिव्सः तुलनात्मक और अंतर्विषयी दृष्टिकोण” था
उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता एमएयूयू के कुलपति प्रो. सैयद ऐनुल हसन ने की। मुख्य अतिथि के रूप में इंग्लिश एण्ड फारेन लैंग्वेज यूनिवर्सिटी, हैदराबाद के कुलपति प्रो. एन. नागराजू उपस्थित रहे। मुख्य वक्तव्य प्रो. राजेन्द्र चेन्नी, निदेशक, मनसा सांस्कृतिक अध्ययन केंद्र, शिवमोग्गा ने दिया।
कार्यक्रम में एमएयूयू के रजिस्ट्रार प्रो. इश्तियाक अहमद, भाषा, भाषाविज्ञान एवं भारतीय अध्ययन संकाय की अधिष्ठाता प्रो. गुलफिशां हबीब, अंग्रेजी विभागाध्यक्ष एवं सम्मेलन निदेशक प्रो. नगेंद्र कोट्टाचेरुवु तथा सह-प्राध्यापिका एवं सम्मेलन संयोजक डॉ. गीता सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे।
प्रो. विभा शर्मा ने भारतीय लोक और स्वदेशी रंगमंचीय परंपराओं की मौखिक परंपरा पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि लिखित इतिहास में दलित, लोक और आदिवासी समुदायों के कलाकारों को व्यवस्थित रूप से हाशिये पर रखा गया है। उन्होंने संत कबीर दास का उल्लेख करते हुए कहा कि सही समझ विकसित करने के लिए हमें पहले स्थापित धारणाओं को “भूलने” की तैयारी करनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि अभिनेता, गायक, कथावाचक और घूम-घूमकर कला प्रस्तुत करने वाले कलाकारों ने भारत की सांस्कृतिक परंपराओं को मजबूत आधार दिया है। आज का रंगमंच, सिनेमा और पार्श्वगायन जैसी मनोरंजन की विधाएं भी इन्हीं लोक परंपराओं से जुड़ी हुई हैं, लेकिन इन कलाकारों को इतिहास में उचित स्थान नहीं मिल पाया।
प्रो. शर्मा ने छात्रों और शोधार्थियों से अपील की कि वे लोक और आदिवासी कलाकारों के जीवन और योगदान को दर्ज करें तथा उनकी जीवन कथाओं का अंग्रेजी में अनुवाद करें, ताकि उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिल सके। उन्होंने कहा कि केवल शोध प्रबंध और लेख लिखना पर्याप्त नहीं है, बल्कि समाज में एक ऐसा सांस्कृतिक आंदोलन भी जरूरी है जो हाशिये के समुदायों की रचनात्मक मेहनत को सम्मान दे।
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