Wednesday, February 11, 2026

उर्दू का अन्य भारतीय भाषाओं से साहित्यिक आदान-प्रदान के साथ गहरा भावात्मक संबंध है

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rof Shambhunath Tiwari

उर्दू का अन्य भारतीय भाषाओं से साहित्यिक आदान-प्रदान के साथ  गहरा भावात्मक संबंध है- प्रो. शंभुनाथ तिवारी

अलीगढ़, 10 फरवरीः भारत की राष्ट्रीय अस्मिता और गौरव की दृष्टि से राम-कृष्ण-गंगा और हिमालय हमारी वैश्विक पहचान सुनिश्चित करते हैं। हमारी अस्मिता के ये सारे प्रतीक भारत की सभी भाषाओं के साहित्य में व्यापक रूप में अभिव्यक्त होते हुए दिखाई देते हैं। चाहे गालिब का चिरागे -दहर’  हो या इकबाल  की नज्मों में राम’ और हिमालय’  का खूबसूरत जिक्र होचाहे नजीर अकबराबादी के किसन कन्हैया’  होंया नजीर बनारसी की गंगा’ और उनके राम-कृष्ण’  होंसभी  इन राष्ट्रीय  गौरवशाली प्रतीकों से अपनी शायरी को हिंदुस्तान की पहचान के रूप में  पेश  करते हैं।”  ये विचार अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के हिंदी विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर शंभुनाथ तिवारी ने राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषदनई दिल्ली द्वारा इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में  आयोजित तीन दिवसीय  विश्व उर्दू सम्मेलन’ के एक तकनीकी सत्र  में व्यक्त किए।

संस्कृत-हिंदी-उर्दू जैसी भाषाओं के बीच भावों के आपसी आदान-प्रदान पर व्यापक रूप से बातचीत करते हुए प्रो. शंभुनाथ तिवारी ने कहा- “ सांस्कृतिक समन्वय और भावों के आपसी आदान-प्रदान के नजरिए से विभिन्न भाषाओं के साहित्य की अहम भूमिका होती है।  भारतीय  परिप्रेक्ष्य में यहाँ की बहुभाषायी परंपरा और बहुभाषिक सहअस्तित्व की भावना सामाजिक और सांस्कृतिक समन्वय को आधार देकर उसे मजबूत बनाती है। उर्दू का अन्य भारतीय भाषाओं से साहित्यिक आदान-प्रदान के साथ  गहरा भावात्मक संबंध है। कुछ प्रमुख भारतीय भाषाओं के क्रम में  विचार करेंतो भारत की सबसे प्राचीन भाषा  संस्कृत और  आधुनिक दृष्टि से हिंदी और उर्दू भारतीय उपमहाद्वीप की ऐसी तीन प्रमुख भाषाएँ हैं भाषायी और साहित्यिक संबंध तथा परस्पर  आदान-प्रदान की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।

उर्दू के हवाले से भाषाएँ अनेक-भाव एकपर बात करते हुए उन्होंने ने कहा, ‘भाषा चाहे कोई होपर सांस्कृतिक दृष्टि से भाव सभी भाषाओं में एक ही होता है। भाषाओं के आपसी आदान-प्रदान से भावाभिव्यक्ति का यह सौंदर्य सांस्कृतिक सहअस्तित्व और समन्वयात्मकता की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। सामाजिक-साम्प्रदायिक सौहार्द में भाषाओं के योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।  इस आदान प्रदान ने भारतीय समाज में बहुलतासहअस्तित्व और सांप्रदायिक सौहार्द की भावना को सुदृढ़ किया है। हिंदी-उर्दू के पारस्परिक संबंधों और  भावों की समानता की दृष्टि से उत्तर मुगल काल ( रीतिकाल) की अवधि में रचा गया हिंदी-उर्दू का साहित्य बहुत उल्लेखनीय है। दोनों में एक सी  समान काव्यप्रवृतियाँ दोनों साहित्य के विशाल पाठक वर्ग को जोड़ने में समर्थ हैं।

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