Prof. Naima Khatoon addressing the Gandhi Jayanti Celebration on dais Prof M Mohin Khan, Prof Aasim Zafar, Prof Nishat Fatima and Dr Ahmad Mujtaba Siddiqui
डिजिटल युग में गांधी के सत्य, स्वराज और मानवतावाद के विचारों की प्रासंगिकता और बढ़ीः कुलपति
अलीगढ़, 2 अक्टूबरः अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में महात्मा गांधी की 157वीं जयंती पर उनके सत्य, अहिंसा, आत्मानुशासन, सामाजिक जिम्मेदारी और समावेशी राष्ट्र निर्माण के विचारों की वर्तमान समय में प्रासंगिकता पर विचार-विमर्श किया गया। कार्यक्रम में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल संचार और वैश्विक चुनौतियों के दौर में गांधी के विचारों को नए संदर्भों में समझने पर जोर दिया गया।
मौलाना आजाद पुस्तकालय के सांस्कृतिक सभागार में आयोजित कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के अधिकारियों, शिक्षकों और विद्यार्थियों ने भाग लिया। इस अवसर पर कुलपति प्रो. नइमा खातून ने मौलाना आजाद पुस्तकालय के केंद्रीय सभागार में महात्मा गांधी से संबंधित पुस्तकों, दस्तावेजों और छाया चित्रों की प्रदर्शनी का उद्घाटन भी किया।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रो. नइमा खातून ने विद्यार्थियों से गांधी के केवल परिचित चित्र से आगे बढ़कर उन सिद्धांतों को समझने का आह्वान किया, जिन्होंने उनके जीवन को दिशा दी। गांधी की आत्मकथा ‘सत्य के साथ मेरे प्रयोग’ का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि गांधी का जीवन निरंतर प्रयोग की प्रक्रिया था। उन्होंने विद्यार्थियों से केवल उनके चित्र पर श्रद्धांजलि अर्पित करने के बजाय उनके द्वारा अपनाए गए मूल्यों को अपने जीवन में समझने और लागू करने का आग्रह किया।
कुलपति ने अलीगढ़ के साथ गांधी के संबंधों का उल्लेख करते हुए 1920 में उनके विश्वविद्यालय आगमन और स्वतंत्रता आंदोलन में मौलाना मोहम्मद अली जौहर तथा शौकत अली की भूमिका को याद किया। उन्होंने कहा कि गांधी का अलीगढ़ से जुड़ाव ऐसे विश्वविद्यालय की भावना को दर्शाता है, जहां बड़े विचारों पर संवाद और प्रश्नों के माध्यम से विचार किया जाता है। उन्होंने गांधी के ‘यंग इंडिया’ में व्यक्त उस विचार का भी उल्लेख किया, जिसमें उन्होंने अपने घर की खिड़कियां सभी संस्कृतियों के लिए खुली रखने, लेकिन किसी भी संस्कृति के प्रभाव में अपनी जड़ों से न उखड़ने की बात कही थी। उन्होंने कहा कि खुलेपन और अपनी जड़ों से जुड़े रहने का यह संतुलन आज भी विश्वविद्यालय और विद्यार्थियों के लिए महत्वपूर्ण है।
प्रो. खातून ने गांधी के सत्य पर जोर और वर्तमान सूचना परिवेश के बीच समानता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आज के समय में मनगढ़ंत तस्वीरें और अपुष्ट संदेश कुछ ही सेकंड में बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंच सकते हैं। ऐसे समय में सत्य के प्रति गांधी की प्रतिबद्धता का नागरिक जीवन में महत्व और बढ़ गया है। उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि संदेश आगे भेजने से पहले उसकी पुष्टि करें और प्रतिक्रिया देने से पहले उसे पढ़ें। उन्होंने इसे दैनिक जीवन में अपनाए जा सकने वाले छोटे-छोटे सत्याग्रह बताया।
कुलपति ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता के संदर्भ में गांधी के मशीनों संबंधी विचारों पर भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि ‘हिंद स्वराज’ में गांधी की चिंता केवल मशीनों को लेकर नहीं थी, बल्कि ऐसी सभ्यता को लेकर थी जो यह सोचे बिना कि वह किस दिशा में जा रही है, गति को ही प्रगति का पैमाना मान लेती है। उन्होंने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के संचार, शिक्षा और निर्णय लेने की प्रक्रियाओं को प्रभावित करने के दौर में तकनीकी विकास को मानवीय मूल्यों पर आधारित रखना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान पीढ़ी के सामने केवल यह प्रश्न नहीं है कि मशीनें कितनी बुद्धिमान बनेंगी, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण है कि मनुष्य यह तय करने के लिए पर्याप्त विवेकशील रहेंगे या नहीं कि इन मशीनों का उपयोग किस उद्देश्य के लिए किया जाना चाहिए।
अपने संबोधन में कुलपति ने गांधी के उस प्रसिद्ध मूल मंत्र का भी उल्लेख किया, जिसमें किसी निर्णय से पहले सबसे गरीब और कमजोर व्यक्ति को याद करने की बात कही गई है। उन्होंने विद्यार्थियों से उन लोगों की गरिमा और जरूरतों पर विचार करने का आह्वान किया, जिनके श्रम से संस्थागत और सामाजिक जीवन चलता है। उन्होंने इस विचार को जलवायु परिवर्तन, युद्ध, पर्यावरणीय क्षरण और सामाजिक असमानता जैसी वर्तमान चुनौतियों से भी जोड़ा।
प्रो. खातून ने कहा, “गांधी ने हमें कोई नया सिद्धांत नहीं दिया, बल्कि हमारा अपना विवेक हमें वापस सौंपा और उसका उपयोग करने को कहा।” उन्होंने विश्वविद्यालय समुदाय से सत्य और अहिंसा के मूल्यों को दैनिक व्यवहार में उतारने का आह्वान किया।
कुलपति ने राष्ट्रीय एकता की शपथ और स्वच्छता की शपथ भी दिलाई। उन्होंने गांधी के राष्ट्रीय एकता और सार्वजनिक स्वच्छता के आदर्शों को वर्तमान नागरिक जिम्मेदारियों से जोड़ने पर जोर दिया।
विश्वविद्यालय के शिक्षकों ने भी गांधी के जीवन और दर्शन के विभिन्न पहलुओं पर विचार रखे। मनोविज्ञान विभाग की प्रो. रूमाना एन. सिद्दीकी ने गांधी के जीवन के मनोवैज्ञानिक और मानवीय पहलुओं पर चर्चा की। उन्होंने वर्तमान जीवन की चुनौतियों और दबावों से निपटने में आत्मानुशासन, सहानुभूति और आंतरिक शक्ति की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला।
उर्दू अकादमी के निदेशक डॉ. जुबैर शादाब खान ने गांधी की साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत पर विचार रखते हुए शांति, सद्भाव और मानवीय गरिमा के उनके संदेश की वर्तमान प्रासंगिकता बताई। उन्होंने सामाजिक एकता को मजबूत करने में संवाद, आपसी सम्मान और समझ के महत्व पर भी जोर दिया।
विद्यार्थी वक्ताओं एमबीबीएस तृतीय वर्ष के शहान उस्मानी और बीए ऑनर्स मनोविज्ञान पांचवें सेमेस्टर की तैयबा फातिमा मजहर ने युवाओं के लिए गांधी को निरंतर प्रेरणा का स्रोत बताया। उन्होंने सत्य, करुणा, साहस और नैतिक दृढ़ता के प्रति गांधी की प्रतिबद्धता का उल्लेख करते हुए युवा पीढ़ी से इन मूल्यों को दैनिक जीवन में अपनाने का आह्वान किया।
मौलाना आजाद पुस्तकालय में कुलपति द्वारा उद्घाटित प्रदर्शनी में महात्मा गांधी से संबंधित पुस्तकें, दस्तावेज और छायाचित्र प्रदर्शित किए गए हैं। प्रदर्शनी में स्वतंत्रता आंदोलन के साथ गांधी के संबंधों और अलीगढ़ से उनके ऐतिहासिक जुड़ाव को भी प्रमुखता से प्रस्तुत किया गया है। यह प्रदर्शनी 2 और 3 अक्टूबर को दर्शकों के लिए खुली रहेगी। गांधी द्वरा हस्तलिखित पत्र, ‘हरिजन’ जैसी गांधी की पत्रिकाऐं तथा गांधी के संपूर्ण लेखन के सभी अंक भी प्रदर्शित किये गये हैं।
कार्यक्रम में सहकुलपति प्रो. मोहम्मद मोहसिन खान, रजिस्ट्रार प्रो. आसिम जफर, शिक्षक, विद्यार्थी और विश्वविद्यालय के अधिकारी उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन डॉ. अहमद मुज्तबा सिद्दीकी ने किया। विश्वविद्यालय की पुस्तकालयाध्यक्ष प्रो. निशात फातिमा ने धन्यवाद ज्ञापित किया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में विश्वविद्यालय के अधिकारी, शिक्षक, विद्यार्थी और कर्मचारी शामिल हुए।
कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ।
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