Thursday, August 20, 2026

Highlights the ‘transformative role of education in nation-building

 


Vice-Chairperson, NCM, GoI, highlights the ‘transformative role of education in nation-building’ at the Independence Day function hosted by Department of Sociology, JMI
 

जामिया के समाजशास्त्र विभाग द्वारा आयोजित स्वतंत्रता दिवस समारोह में एनसीएम, भारत सरकार के उपाध्यक्ष ने 'राष्ट्र-निर्माण में शिक्षा की परिवर्तनकारी भूमिका' को किया रेखांकित


जामिया मिल्लिया इस्लामिया (जेएमआई) के समाजशास्त्र विभाग ने 18 अगस्त 2026 को जामिया के एफटीके-सीआईटी कॉन्फ्रेंस हॉल में "इंडीपेंडेंस डे-2026: फ्रीडम, रिस्पोंसीबिलिटी एंड शेयर्ड नेबरहुड" विषय पर एक दिवसीय सेमिनार का आयोजन किया। इस सेमिनार में जाने-माने शिक्षाविदों, विद्वानों, फैकल्टी सदस्यों और छात्रों ने समकालीन भारत में स्वतंत्रता, जिम्मेदारी, विविधता और साझा राष्ट्रत्व की अवधारणा पर विचार-विमर्श किया।

 

उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता जामिया के रजिस्ट्रार प्रो. मो. महताब आलम रिज़वी ने की। भारत सरकार के राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग की उपाध्यक्ष श्रीमती एस. मुनव्वरी बेगम मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुईं। पद्म श्री प्रो. अख्तरुल वासे ने मुख्य वक्तव्य दिया, जबकि जामियाके सामाजिक विज्ञान संकाय के डीन प्रो. जुबैर मीनाई ने विशेष संबोधन दिया।

 

मेहमानों और प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए, समाजशास्त्र विभाग की अध्यक्ष और सेमिनार की संयोजक प्रो. अज़रा आबिदी ने इस बात पर जोर दिया कि स्वतंत्रता न केवल एक ऐतिहासिक उपलब्धि है, बल्कि एक निरंतर सामाजिक जिम्मेदारी भी है। उन्होंने संवैधानिक मूल्यों, सामाजिक न्याय, भाईचारे, संवाद और जिम्मेदार नागरिकता को बढ़ावा देने में शिक्षा और विश्वविद्यालयों की भूमिका पर प्रकाश डाला।

 

अपने संबोधन में, श्रीमती एस. मुनव्वरी बेगम ने सामाजिक विकास और राष्ट्र-निर्माण में शिक्षा की परिवर्तनकारी भूमिका पर जोर दिया। उन्होंने राष्ट्रत्व की अवधारणा पर विचार व्यक्त किए और 'विकसित भारत-2047' के विजन की प्रासंगिकता को रेखांकित किया। उन्होंने स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदानों को भी नमन किया और इस बात पर जोर दिया कि उनकी विरासत नागरिकों, विशेषकर युवा पीढ़ी को समकालीन राष्ट्र-निर्माण में सक्रिय रूप से योगदान करने के लिए प्रेरित करे। प्रोफ़ेसर अख्तरुल वासे ने भारतीय राष्ट्रवाद के बौद्धिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर विचार रखे, जबकि प्रोफ़ेसर ज़ुबैर मीनाई ने लोकतांत्रिक मूल्यों, सामाजिक एकता और राष्ट्रवाद की समावेशी समझ को मज़बूत करने में शैक्षणिक संस्थानों की ज़िम्मेदारी पर ज़ोर दिया।

 

उद्घाटन सत्र के बाद, आज़ादी, ज़िम्मेदारी और साझा राष्ट्रवाद से जुड़े विषयों पर दो तकनीकी सत्र और एक विशेष व्याख्यान आयोजित किए गए। शैक्षणिक सत्रों में शिक्षा, नेतृत्व, नागरिकता, विविधता, सामाजिक ज़िम्मेदारी और समावेशी राष्ट्र-निर्माण जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई। जामिया के इतिहास और संस्कृति विभाग की प्रोफ़ेसर फरहत नसरीन ने विशेष व्याख्यान दिया और आज़ादी, राष्ट्रवाद और आज के समय में उनकी अहमियत पर ऐतिहासिक नज़रिए से चर्चा को समृद्ध किया।

 

चर्चा में इस बात पर ज़ोर दिया गया कि शिक्षा, समानता, आपसी सम्मान, सामाजिक एकजुटता और सक्रिय नागरिकता के ज़रिए साझा राष्ट्रवाद मज़बूत होता है। इन सत्रों ने फैकल्टी सदस्यों, शोधार्थियों और छात्रों के बीच बातचीत के लिए एक सार्थक मंच भी प्रदान किया।

 

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