Wednesday, May 13, 2026

ALLAH MARHOOM MUKHTAR AHMAD ANSARI KO JANNAT ATA FARMAYE----SALAMEVATAN


 MUKHTAR AHMAD ANSARI

कम लोगों को पता होगा कि बाहुबली मुख्तार अंसारी के दादा थे मुख्तार अहमद अंसारी और 1948 की भारत - पाकिस्तान जंग के हीरो , ' नौशेरा के शेर ' ब्रिगेडियर उस्मान , नाना पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी रिश्ते में चाचा

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डॉ. मुख़्तार अहमद अंसारी नामी , ऊंची शोहरत के चिकित्सक और राष्ट्रवादी मुस्लिम नेता थे जिनकी भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में अविस्मरणीय भूमिका थी वाराणसी में काशी विद्यापीठ और दिल्ली में जामिया मिल्लिया विश्वविद्यालय स्थापित कराने में उनका महत्वपूर्ण योगदान था

डॉ. मुख़्तार अहमद अंसारी का जन्म 25 दिसम्बर 1880 को उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ीपुर ज़िले में हुआ उन्होंने मद्रास ( वर्तमान चेन्नई ) और इंग्लैंड में चिकित्सा के क्षेत्र में शिक्षा ग्रहण की उन्होंने ' एडिनबरा विश्वविद्यालय ' से अपनी शिक्षा पूरी की और कई साल तक लंदन के विभिन्न अस्पतालों में काम किया

वह महात्मा गांधी को बहुत प्रिय थे और उनके भरोसे के सिपाही थे 1896 में उत्तर प्रदेश के गाज़ीपुर से हाई स्कूल की पढ़ाई के बाद अंसारी अपने भाइयों के पास हैदराबाद गए और उच्च शिक्षा हासिल की ग्रैजुएशन के बाद मद्रास मेडिकल कॉलेज में उन्हें निज़ाम स्कॉलरशिप से दाखिला मिला क्योंकि वह बहुत मेधावी विद्यार्थी थे एमडी और एमएस की डिग्री में सर्वोच्च स्थान पाने के बाद उन्हें लंदन के लॉक अस्पताल में रजिस्ट्रार नियुक्त किया गया यह पहली उपलब्धि किसी भारतीय के नाम रही

भारत के शुरूआती सर्जन ज़नाब अंसारी साहब ने इसके बाद लॉक अस्पताल के साथ ही, लंदन के ही चेयरिंग क्रॉस अस्पताल के लिए भी बेहतरीन सेवाएं दीं इसके नतीजे में आज भी चेयिरिंग क्रॉस अस्पताल में उनकी याद में अंसारी वार्ड बना हुआ है

मद्रास में पढ़ाई के दौरान 1898 में पहली बार अंसारी साहब ने आनंद मोहन बोस की अध्यक्षता में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में दर्शक के तौर पर हिस्सा लिया था 1927 में जब मद्रास में अगली बार कांग्रेस का अधिवेशन हुआ तब खुद अंसारी साहब उसके अध्यक्ष थे

इन 29 सालों में लंदन में रहते हुए उनका जुड़ाव कांग्रेस के नेताओं से बना रहा इसी जुड़ाव के चलते वह लंदन की सुख - सुविधा की ज़िंदगी छोड़कर भारत आए और मुस्लिम लीग कांग्रेस से जुड़कर राजनीति में सक्रिय हुए लेकिन , उन्होंने यहां भी अपनी मेडिकल प्रैक्टिस लगातार जारी रखी

प्रखर राष्ट्रवादी नेता अंसारी साहब खिलाफत आंदोलन के मुखर समर्थक रहे थे बालकन युद्ध के समय तुर्की सैनिकों के इलाज के लिए मेडिकल मिशन में उनकी प्रमुख भूमिका थी पश्चिमी क्रूरता के विरोध में छह महीनों तक भारतीयों खासकर भारतीय मुस्लिमों ने ओटोमान साम्राज्य के सैनिकों के लिए यह मिशन चलाया था, जिसके तहत चंदे के ज़रिये मिली रकम से दवाएं और मेडिकल उपकरण तुर्की पहुंचाए गए थे

अंसारी साहब धर्म के आधार पर बंटवारे के समर्थक कभी नहीं थे 1920 के दशक में जब मुस्मिल लीग में मोहम्मद अली जिन्ना का प्रभुत्व बढ़ा और बंटवारे की राजनीति को हवा मिलने लगी, तब अंसारी ने महात्मा गांधी के विचारों को तरजीह देते हुए कांग्रेस के साथ अपनी नज़दीकियां और मज़बूत कीं और जिन्ना का विरोध किया

अंसारी जी की कोठी दारुस्सलाम यानी ' शांति का ठिकाना ' पर गांधीजी जब भी दिल्ली आया करते थे, रुकते थे इसके अलावा यह कोठी अरुणा आसफ अली और मनुभाई शाह जैसे क्रांतिकारियों के छुपने का ठिकाना भी हुआ करती थी यहीं अंसारी की मेडिकल प्रैक्टिस चलती थी और यहीं कांग्रेस की बैठकें हुआ करती थीं



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